मानव के लालच और स्वार्थ का प्रकृति पर प्रभाव निबंध

सृष्टि पर रहने वाले सभी जीवो में से मनुष्य सबसे समझदार प्राणी है। मनुष्य ने अपनी बुद्धि से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करना सीख लिया। प्रकृति ने मनुष्य को रोटी, कपड़ा और मकान दिया। पर मनुष्य ने प्रकृति को क्या दिया – प्रदूषण, प्राकृतिक संपदा का दोहन, वन्यजीवों का संहार।

प्रकृति ने मानव को फल सब्जियां और अनाज दिए जबकि मनुष्य ने ज्यादा जल्दी पाने के लालच में इन वस्तुओं के प्राकृतिक रूप में मिलावट कर उनके असली सौंदर्य और स्वाद को ही खराब कर दिया। प्रकृति ने अपने गर्भ में खनिज लवण और बेशकीमती सोना चांदी और हीरे- जवाहरात दिए। मनुष्य ने इन्हीं सुंदर आभूषणों में बदलकर अपने शारीरिक सौंदर्य को बढ़ाया। धीरे-धीरे मनुष्य स्वार्थी होकर उन्हें बेचकर ज्यादा पैसा कमाने की चाह में ज्यादा खुदाई करने लगा और धरती पर भूकंप, भूस्खलन, बाढ़ जैसी समस्याएं पैदा हो गई।

मनुष्य ने जंगलों को काट कर हवाई और जमीनी रास्ते तैयार कर एक देश से दूसरे देश में चुटकी बजाते ही पहुंचना संभव कर दिया। कितना समझदार प्राणी है ना मनुष्य ? पर मानव भूल गया कि आविष्कार के साथ अवांछित तत्व भी आते हैं, पर वह उन्हें अनदेखा कर वह केवल आगे बढ़ता गया। इतना आगे निकल गया कि पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी विकिरणों से बचाने वाली ओज़ोन परत में भी छेद हो गया।

मानव का आज तक का सबसे उपयोगी आविष्कार- प्लास्टिक- ने पूरी दुनिया में तहलका मचा रखा है। प्लास्टिक बहुत उपयोगी है पर मनुष्य ने इसके उपयोग के लिए कोई नियम या सीमायें तय नहीं की। जिसकी वजह से धरती प्लास्टिक के तले दब गई है । मनुष्य इससे छुटकारा पाने के उपाय ढूंढने में लगा है।

मनुष्य बिना रुके अपने कामों में लगा प्रकृति का दोहन करने में किसी भी तरीके से ना रुका था, तब प्रकृति ने 2019 में ऐसा तांडव दिखाया कि पूरे विश्व के मानव जाति की चाल रुक गई। एक ऐसी संक्रामक बीमारी फैली जिससे अपने आप को बचने के लिए मानव ने स्वयं को घर के अंदर कैद कर लिया।

तब प्रकृति ने मौके का फायदा उठाया और अपने सीने पर लगे जख्मों को ठीक करने का निर्णय किया। तब वायु, पशु -पक्षी, पेड़ -पौधे, सभी स्वतंत्र और खुश नजर आए ।वे इधर-उधर शान से विचरण करने लगे। केवल मानव हाथ पर हाथ धरे अपने घर के अंदर बैठा रहा। इतना सब झेलने के बाद भी प्रकृति जननी की तरह अपने बच्चों को केवल एक फटकार लगाकर छोड़ देती है कि यदि वह चाहे तो अब भी सुधर सकता है । मनुष्य को इस बात से सबक लेना चाहिए कि यह धरती केवल उसकी अकेले की नहीं है। प्रकृति द्वारा दिए गए उपहारों का सदुपयोग कर और अपने लालच और स्वार्थ पर काबू कर, ‘जियो और जीने दो’ के नियम का पालन करने से यह धरती फिर से हरी-भरी और सुंदर हो सकती है।

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